कानपुर। ज्ञान अर्जित करने और समाज की सेवा करने की कोई तय उम्र नहीं होती। इस जीवंत संदेश को हकीकत में बदला है कानपुर के विकासनगर निवासी 75 वर्षीय विमलेश शंकर अवस्थी ने। छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय (CSJM) के आगामी दीक्षांत समारोह में विमलेश जी को एमए हिंदू स्टडीज की उपाधि प्रदान की जाएगी। अपने युवा सहपाठियों के बीच ‘दादा जी’ के नाम से लोकप्रिय विमलेश जी का सफर यहीं खत्म नहीं हो रहा है; वे अब प्राचीन भारतीय स्पर्श चिकित्सा को वैज्ञानिक स्तर पर स्थापित करने के लिए पीएचडी (PhD) करने की तैयारी में हैं, जिसके लिए उन्होंने यूजीसी नेट की परीक्षा भी दी है।
51 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद दोबारा थामी कलम
विमलेश जी की यह शैक्षणिक यात्रा बेहद प्रेरणादायी है क्योंकि उन्होंने एक लंबे ब्रेक के बाद अपनी पढ़ाई को पुनर्जीवित किया।
विमलेश जी के पारिवारिक पृष्ठभूमि की बात करें तो उनके पिता कानपुर महापालिका के स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत थे और माता कुशल गृहणी थीं। वह चार भाई हैं।
राष्ट्रपति पुरस्कार से लेकर बैंकिंग करियर तक का सफर
बैंकिंग क्षेत्र में एक लंबा समय बिताने वाले विमलेश जी का शुरुआती कार्यक्षेत्र काफी अलग था:
स्पर्श चिकित्सा (रेकी) में ढाई दशकों का अनुभव और शोध
विमलेश जी वर्ष 1997 से ही स्पर्श चिकित्सा सीख रहे हैं, जिसे वैश्विक स्तर पर या जापान में ‘रेकी’ के नाम से जाना जाता है। पिछले 25 वर्षों से वे बिना किसी दवा या मंत्र के, केवल स्पर्श के माध्यम से लोगों का इलाज कर रहे हैं। वे अब तक सैकड़ों शिष्यों को इस विधा का प्रशिक्षण भी दे चुके हैं।लघु शोध पत्र अपने एमए पाठ्यक्रम के दौरान उन्होंने ‘इफेक्ट ऑफ प्राण हीलिंग ऑन इनसोमेनिया, स्ट्रेस एंड डिप्रेशन’ विषय पर एक रिसर्च पेपर भी जमा किया है। इसमें उन्होंने स्पर्श चिकित्सा से पूरी तरह ठीक हो चुके सैकड़ों मरीजों की केस स्टडीज और प्रामाणिक डेटा को शामिल कर इस विधा की वैज्ञानिकता को साबित किया है।
क्या है स्पर्श चिकित्सा का वैज्ञानिक आधार?
विमलेश शंकर जी के अनुसार, मानव शरीर के किसी भी हिस्से में नकारात्मक ऊर्जा का इकट्ठा होना ही बीमारी की मुख्य वजह है।